लोकतंत्र के मंदिर में राजतंत्र का प्रतीक 'सेंगोल' स्थापित करने वाले लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ की रैली कैसे निकाल सकते हैं?
लोकतंत्र बचाओ या सत्ता बचाओ? जनता की आवाज को भीड़तंत्र और अराजकता बताने वालों से देश पूछ रहा है सवाल!
लेखक: राजेश कुमार सिद्धार्थसंपादक – राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अब तक न्यायसंपादकीय विचार | विशेष टिप्पणी
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इस देश को आजादी दिलाने के लिए लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, क्रांतिकारियों और देशभक्तों ने अपना जीवन कुर्बान किया। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद सहित असंख्य वीरों ने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध संघर्ष किया, जेलों में यातनाएं सहीं और अपने प्राणों की आहुति दी। उनके संघर्षों के परिणामस्वरूप देश आजाद हुआ और भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत भारतीय संविधान है, जिसे संविधान सभा ने डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता वाली प्रारूप समिति के नेतृत्व में तैयार किया। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार दिया।
लेकिन आज सवाल यह है कि क्या देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो रही है? क्या जनता की आवाज को सम्मान मिल रहा है? क्या सरकारें जनता के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हैं?
1. लोकतंत्र के मंदिर में राजतंत्र का प्रतीक सेंगोल क्यों?
देश की नई संसद में सेंगोल (राजदंड) स्थापित किया गया। सेंगोल को राजसत्ता और ऐतिहासिक राजकीय परंपरा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
संसद जनता के प्रतिनिधियों का सर्वोच्च विधायी मंच है। यहां संविधान, कानून, जनता के अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की सर्वोच्चता होनी चाहिए।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजदंड जैसे प्रतीक को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है? क्या संसद की असली पहचान संविधान, लोकतांत्रिक परंपराओं और जनता की संप्रभुता से नहीं होनी चाहिए?
भारत का लोकतंत्र किसी राजा या शासक की कृपा से नहीं, बल्कि जनता के संघर्ष और संविधान की ताकत से चलता है।
2. वोट चोरी और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठते सवाल
देश में ईवीएम, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
राहुल गांधी सहित विपक्ष के कई नेताओं ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और वोट चोरी के आरोप लगाए हैं। मतदाता सूची से नाम हटने, नए नाम जुड़ने और चुनावी पारदर्शिता को लेकर जनता के बीच भी सवाल हैं।
यदि किसी राजनीतिक दल या नागरिक संगठन के पास चुनावी अनियमितताओं के प्रमाण हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह प्रत्येक सवाल का तथ्यात्मक और पारदर्शी जवाब दे।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठने वाले सवालों का समाधान तथ्यों, जांच और संवैधानिक जवाबदेही से होना चाहिए।
क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध है? क्या चुनावी पारदर्शिता की मांग करना अराजकता है?
3. आंदोलन करने वाली जनता भीड़तंत्र और अराजक कैसे?
लोकतंत्र में जनता को अपनी बात रखने, शांतिपूर्ण विरोध करने और सरकार से जवाब मांगने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
जब बेरोजगार नौजवान, छात्र-छात्राएं, किसान, मजदूर और सामाजिक संगठन अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो उन्हें सीधे भीड़तंत्र या अराजक कहना लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है।
जनता ही सरकार चुनती है। जनता ही प्रतिनिधियों को सत्ता तक पहुंचाती है। इसलिए जनता की आवाज को अपमानित करने के बजाय उसकी समस्याओं को सुनना सरकार का नैतिक और संवैधानिक दायित्व है।
यदि किसी आंदोलन में हिंसा या कानून का उल्लंघन होता है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों को केवल सरकार की आलोचना करने के कारण अराजक नहीं कहा जा सकता।
4. लोकतंत्र की परिभाषा सरकार में बैठे लोगों को समझनी चाहिए
लोकतंत्र को अंग्रेजी में Democracy कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति यूनानी भाषा के दो शब्दों से मानी जाती है।
- डेमोस (Demos) का अर्थ है जनता।- क्रेटोस (Kratos) का अर्थ है शासन या सत्ता।
अर्थात लोकतंत्र का शाब्दिक अर्थ है जनता का शासन।
लोकतंत्र ऐसी व्यवस्था है, जिसमें सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति जनता में निहित होती है। जनता प्रत्यक्ष या अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन में भाग लेती है।
इसलिए लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतकर सरकार बना लेना नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है जनता के प्रति जवाबदेही, संविधान का सम्मान, विपक्ष की भूमिका, स्वतंत्र पत्रकारिता और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा।
5. आरएसएस के विचारों और लोकतांत्रिक व्यवहार पर सवाल
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर की पुस्तक 'बंच ऑफ थॉट्स' के हिंदी संस्करण 'विचार नवनीत' में लोकतांत्रिक व्यवस्था, सत्ता और नेतृत्व के व्यवहार को लेकर विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
इस पुस्तक के पृष्ठ 508 पर लोकतांत्रिक व्यवस्था के कर्णधारों के व्यवहार और लंबे समय तक पद पर बने रहने की प्रवृत्ति पर विचार किया गया है।
इस संदर्भ में सवाल है कि जो लोग लंबे समय तक सत्ता में बने रहने की इच्छा व्यक्त करते हैं, क्या उनका व्यवहार लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है?
अमित शाह और नरेंद्र मोदी के लंबे समय तक सत्ता में रहने संबंधी राजनीतिक बयानों को भी इसी लोकतांत्रिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक दल स्थायी रूप से सत्ता का मालिक नहीं होता। सत्ता जनता की होती है और जनता ही चुनाव के माध्यम से सरकार बदलने का अधिकार रखती है।
6. आंदोलन और सरकार की जवाबदेही पर गोलवलकर के विचार
'विचार नवनीत' में सरकार के प्रति बढ़ते असंतोष, जनता की निराशा और समस्याओं के समाधान के लिए आंदोलनों की आवश्यकता पर भी विचार व्यक्त किए गए हैं।
इस विचार का मूल संदेश यह समझा जा सकता है कि सरकार को जनता के असंतोष और समस्याओं को समय रहते समझना चाहिए तथा सद्भावनापूर्वक उचित कार्रवाई करनी चाहिए।
तो सवाल है कि जब जनता चुनावी पारदर्शिता, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों को लेकर सवाल उठाती है, तब सरकार को संवाद करना चाहिए या आंदोलनकारियों को बदनाम करना चाहिए?
सरकार की जिम्मेदारी है कि वह असहमति का सम्मान करे और समस्याओं का समाधान संवैधानिक तरीके से करे।
7. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का संविधान और लोकतंत्र
भारत के संविधान निर्माता डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर ने देश को एक ऐसा संविधान दिया, जिसमें प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार प्राप्त हैं।
उन्होंने सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव और शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया।
डॉ. आंबेडकर का स्पष्ट संदेश था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है, जब समाज में सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना हो।
समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व लोकतंत्र के मूल आधार हैं।
आज जरूरत है कि सरकार और सभी राजनीतिक दल संविधान की प्रस्तावना को केवल समारोहों में पढ़ने तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने व्यवहार और नीतियों में भी लागू करें।
8. नई संसद और राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका पर सवाल
नई संसद के उद्घाटन समारोह को लेकर भी देश में व्यापक बहस हुई थी।
28 मई 2023 को नई संसद का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। विपक्ष के कई दलों ने इस समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को आमंत्रित न किए जाने पर सवाल उठाए थे।
राष्ट्रपति देश के संवैधानिक प्रमुख हैं। ऐसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय समारोह में राष्ट्रपति की भूमिका और संवैधानिक गरिमा को लेकर उठे सवालों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए था।
इसी तरह पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से जुड़े धार्मिक स्थलों में कथित भेदभाव के प्रसंगों ने भी सामाजिक समानता और जातिगत भेदभाव पर बहस को जन्म दिया था।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। किसी व्यक्ति के साथ जाति या सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव स्वीकार नहीं किया जा सकता।
9. लोकतंत्र बचाओ और अराजकता हटाओ रैली निकालने वालों से कुछ सवाल
जो लोग लोकतंत्र बचाने और अराजकता हटाने की बात करते हैं, उनसे देश की जनता कुछ बुनियादी सवाल पूछना चाहती है।
1. क्या सरकार की आलोचना करना अराजकता है?2. क्या चुनाव आयोग से सवाल पूछना लोकतंत्र के विरुद्ध है?3. क्या मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की जांच की मांग करना गलत है?4. क्या बेरोजगार युवाओं और किसानों की आवाज उठाना भीड़तंत्र है?5. क्या शांतिपूर्ण आंदोलन करने वाले नागरिकों को अपमानित करना लोकतांत्रिक आचरण है?6. क्या संसद की सर्वोच्चता संविधान से है या किसी राजकीय प्रतीक से?7. क्या सत्ता में बैठे लोगों को विपक्ष और जनता के सवालों का जवाब नहीं देना चाहिए?
इन सवालों का जवाब किसी रैली के नारे से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवहार और संवैधानिक जवाबदेही से दिया जाना चाहिए।
10. लोकतंत्र के असली प्रहरी कौन?
लोकतंत्र के असली प्रहरी वे नागरिक हैं, जो संविधान की रक्षा के लिए आवाज उठाते हैं, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करते हैं, सामाजिक समानता की मांग करते हैं और सत्ता से जवाब मांगने का साहस रखते हैं।
लोकतंत्र केवल सरकार का नाम नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष चुनाव आयोग, स्वतंत्र मीडिया और जागरूक नागरिकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
प्रशांत भूषण, कपिल सिब्बल सहित अनेक वरिष्ठ अधिवक्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक नेताओं ने अलग-अलग अवसरों पर लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दे उठाए हैं।
उनके विचारों से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन किसी भी नागरिक या बुद्धिजीवी को केवल सवाल उठाने के कारण अराजक घोषित करना उचित नहीं है।
अंतिम सवाल: लोकतंत्र बचाना है या सत्ता की राजनीति करनी है?
भारत की जनता ने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध संघर्ष करके आजादी हासिल की थी। यह आजादी किसी एक राजनीतिक दल, संगठन या व्यक्ति की देन नहीं है। इसके पीछे असंख्य देशभक्तों का बलिदान है।
आज भी देश को संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और समानता की रक्षा के लिए जागरूक नागरिकों की आवश्यकता है।
सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, उसे यह समझना होगा कि लोकतंत्र में जनता मालिक होती है और सरकार जनता की सेवक।
जो जनता सरकार बनाती है, उसे सरकार से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।
लोकतंत्र में असहमति देशद्रोह नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार है। शांतिपूर्ण आंदोलन अराजकता नहीं, बल्कि जनता की आवाज है। चुनावी पारदर्शिता की मांग लोकतंत्र को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करती है।
इसलिए देश की जनता से अपील है कि संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और भाईचारे की रक्षा के लिए जागरूक रहें। किसी भी प्रकार की हिंसा, नफरत और वैमनस्य से दूर रहकर शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ें।
याद रखिए, सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन संविधान और लोकतंत्र की गरिमा स्थायी रहनी चाहिए।
जय भीम! जय भारत! जय संविधान! जय लोकतंत्र!
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राजेश कुमार सिद्धार्थसंपादकराष्ट्रीय हिंदी दैनिक अब तक न्याय
निष्पक्ष • निर्भीक • स्वतंत्रताकि सच जिंदा रहे।
State
लोकतंत्र के मंदिर में राजतंत्र का प्रतीक 'सेंगोल' स्थापित करने वाले लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ की रैली कैसे निकाल सकते हैं?